

भरत लाल गुप्ता
शहरों में योग उत्सव, गांवों में योग का अस्तित्व संकट में
12वें अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर हसदेव अंचल से उठे सवाल, ग्रामीण क्षेत्रों तक क्यों नहीं पहुंची योग क्रांति?
सलका, सरगुजा। देशभर में 21 जून को 12वां अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस उत्साह और भव्यता के साथ मनाया गया। प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक योग कार्यक्रमों में शामिल हुए और “स्वयं और समाज के लिए योग” थीम के साथ करोड़ों लोगों को योग का संदेश दिया गया। लेकिन ग्रामीण भारत, विशेषकर आदिवासी और दूरस्थ क्षेत्रों की तस्वीर इस उत्सव से बिल्कुल अलग दिखाई देती है। यहां योग दिवस केवल एक दिन की औपचारिकता बनकर रह गया है, जबकि गांवों में योग की परंपरा धीरे-धीरे विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गई है।
गांवों में नहीं हैं योग शिक्षक, कैसे पहुंचे योग?
छत्तीसगढ़ के सरगुजा, जशपुर और बस्तर जैसे आदिवासी बहुल जिलों के अनेक गांवों में 21 जून को कोई संगठित योग कार्यक्रम नहीं हो सका। स्थानीय जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों का कहना है कि अधिकांश पंचायतों में प्रशिक्षित योग शिक्षकों की भारी कमी है।
हसदेव अंचल के ग्राम सलका निवासी 68 वर्षीय शिवनाथ यादव बताते हैं कि एक समय गांवों में सूर्य नमस्कार, प्राणायाम और विभिन्न योग क्रियाएं दैनिक जीवन का हिस्सा थीं, लेकिन आज नई पीढ़ी को इन्हें सिखाने वाला कोई नहीं बचा है। उनके अनुसार, यदि यही स्थिति रही तो कई पारंपरिक योग विधाएं आने वाले वर्षों में पूरी तरह समाप्त हो जाएंगी।

बढ़ती चिंता, घटती परंपरा
ग्रामीण युवा जन कल्याण समिति की अध्यक्ष श्रीमती तपस्या बाई का कहना है कि योग दिवस के अवसर पर प्रशासनिक आयोजन तो होते हैं, लेकिन वर्ष के शेष दिनों में गांवों में योग प्रशिक्षण की कोई व्यवस्था नहीं दिखाई देती। उनका मानना है कि युवाओं में बढ़ती मोबाइल निर्भरता, शारीरिक निष्क्रियता और नशे की प्रवृत्ति को रोकने में योग महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
योग प्रशिक्षक भरत लाल गुप्ता ने कहा कि पिछले कई वर्षों से पंचायत स्तर पर योग शिक्षकों की नियुक्ति की मांग की जा रही है, लेकिन अब तक इस दिशा में ठोस पहल नहीं हो सकी है। उनका मानना है कि जब तक गांव-गांव में प्रशिक्षित योग शिक्षक उपलब्ध नहीं होंगे, तब तक योग का वास्तविक लाभ आम लोगों तक नहीं पहुंच पाएगा।
स्वास्थ्य और संस्कृति दोनों पर असर
ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ती जीवनशैली संबंधी बीमारियां, नशे की प्रवृत्ति और शारीरिक सक्रियता में कमी को लेकर भी चिंता व्यक्त की जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि योग केवल व्यायाम नहीं, बल्कि प्रकृति, संस्कृति और संतुलित जीवनशैली से जुड़ा एक समग्र दर्शन है। इसके कमजोर पड़ने से सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों पर भी प्रभाव पड़ रहा है।

उम्मीद अभी बाकी है
इन चुनौतियों के बीच कुछ ग्रामीण परिवार और बुजुर्ग महिलाएं अब भी अपने स्तर पर बच्चों को योग सिखाने का प्रयास कर रही हैं। सलका की श्याम कुंवर जैसी महिलाएं प्रतिदिन सुबह बच्चों को योगाभ्यास कराकर इस परंपरा को जीवित रखने की कोशिश कर रही हैं।
बड़ा सवाल
अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के भव्य आयोजनों के बीच सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या योग केवल शहरों और मंचों तक सीमित रहेगा, या फिर इसकी पहुंच वास्तव में गांव-गांव तक सुनिश्चित की जाएगी? यदि ग्रामीण क्षेत्रों में प्रशिक्षित योग शिक्षक, संसाधन और नियमित प्रशिक्षण की व्यवस्था नहीं हुई, तो योग की समृद्ध परंपरा आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल पुस्तकों और समारोहों तक सीमित होकर रह जाएगी।
Author: anil sahu
जिला प्रतिनिधि सूरजपुर






