

भरत लाल गुप्ता
सामाजिक कार्यकर्ता कन्हाई राम बंजारा ने तिलहन खेती, प्राकृतिक तेलों के उपयोग और पारंपरिक तेल उत्पादन को बढ़ावा देने पर दिया जोर
रसोई और दैनिक जीवन से दूर हो रहा पारंपरिक तेल, स्वस्थ जीवन के लिए कच्ची घानी की ओर लौटना जरूरी
उदयपुर। विकासखंड उदयपुर में सामाजिक स्वास्थ्य के प्रति निरंतर चिंतन करने तथा समाज को नई दिशा देने के साथ युवा पीढ़ी के लिए नवाचार कार्यों को पहल के साथ गति देने वाले सामाजिक कार्यकर्ता कन्हाई राम बंजारा ने कहा कि पारंपरिक तेल धीरे-धीरे हमारी थाली और दैनिक व्यवहार से गायब होता जा रहा है। आधुनिक जीवनशैली के बीच यदि हमें स्वस्थ और निरोगी जीवन जीना है तो प्राकृतिक, शुद्ध एवं पारंपरिक तेलों की ओर फिर से लौटने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वज सरसों, तिल, अलसी, मूंगफली सहित विभिन्न तिलहन फसलों से घर में अथवा स्थानीय स्तर पर कच्ची घानी के माध्यम से तेल निकालकर उसका उपयोग भोजन बनाने, शरीर में लगाने तथा अन्य घरेलू आवश्यकताओं में करते थे। पारंपरिक रूप से तैयार किए जाने वाले इन तेलों का ग्रामीण जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रहा है।
बदलती जीवनशैली से बढ़ी चिंता
भरत लाल गुप्ता ने कहा कि पहले भोजन में तेल का उपयोग सीमित मात्रा में किया जाता था। कई खाद्य पदार्थों को भूनकर अथवा पानी में उबालकर भी तैयार किया जाता था। लेकिन वर्तमान समय में बदलती जीवनशैली के कारण लगभग हर प्रकार के भोजन और सब्जियों में अधिक मात्रा में तेल का उपयोग होने लगा है। इसके चलते भोजन की गुणवत्ता और स्वास्थ्य को लेकर चिंता भी बढ़ी है।
उन्होंने कहा कि तेल का उपयोग संतुलित मात्रा में किया जाना चाहिए तथा गुणवत्तापूर्ण तेल का चयन स्वस्थ जीवन के लिए महत्वपूर्ण है। प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त शुद्ध तेलों को प्राथमिकता देकर खान-पान की गुणवत्ता में सुधार किया जा सकता है।
तिलहन खेती को बढ़ावा देने की जरूरत
उन्होंने किसानों से अपने खेतों में सरसों, तिल, मूंगफली, अलसी एवं अन्य तिलहन फसलों की प्राकृतिक और जैविक तरीके से खेती करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि तिलहन फसलों के उत्पादन को बढ़ावा मिलने से किसानों को अपनी उपज का बेहतर मूल्य मिल सकता है। इसके साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर तेल प्रसंस्करण को बढ़ावा देकर रोजगार एवं स्वरोजगार के नए अवसर भी विकसित किए जा सकते हैं।
घर में कच्ची घानी का तेल अपनाने पर जोर
उन्होंने आगे कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में उपलब्ध जमीन का उपयोग कर परिवार अपनी आवश्यकता के अनुसार तिलहन फसलों की खेती कर सकते हैं और स्थानीय स्तर पर कच्ची घानी से तेल निकालकर उसका उपयोग कर सकते हैं। इससे स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा और बाजार से तेल खरीदने पर होने वाले खर्च में भी कमी लाई जा सकती है।
उन्होंने कहा कि शुद्धता, संतुलित मात्रा और प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त तेल को प्राथमिकता देना स्वस्थ परिवार और स्वस्थ समाज की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल हो सकती है।
ग्रामीण युवा जन कल्याण समिति चला रही जनजागरूकता अभियान
इस दिशा में सरगुजा जिले में समाजसेवी संस्था ग्रामीण युवा जन कल्याण समिति, उदयपुर द्वारा पारंपरिक तेल के उपयोग, संरक्षण एवं संवर्धन को लेकर लगातार ग्रामीण क्षेत्रों में जनजागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। संस्था का प्रयास है कि पारंपरिक तेल उत्पादन एवं उपयोग की पद्धतियों को संरक्षित करने के साथ ग्रामीण समुदाय को प्राकृतिक एवं स्थानीय संसाधनों से जोड़कर स्वस्थ जीवनशैली के प्रति जागरूक किया जाए।
समिति द्वारा चलाए जा रहे इस अभियान का उद्देश्य आम लोगों को पारंपरिक तेलों के महत्व से परिचित कराना, तिलहन खेती को प्रोत्साहित करना तथा स्थानीय स्तर पर तेल प्रसंस्करण की संभावनाओं को बढ़ावा देना है, ताकि ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होने के साथ आम जिंदगी स्वस्थ और खुशहाल बन सके।





