
*बस आप कल्पना कीजिये..*
भीषण गर्मी, तपते खंभे
पिघलती हुई बिजली की वायर, और पूरी दोपहरी में काम करता हुआ बिजली कर्मचारी
और सैकड़ो लोगों के निरंतर फ़ोन लाइट कब आएंगी, कबकी गई है
, कुछ काम नहीं करते फ्री की तनख्वाह ले रहे हो इन सबके बीच 45 डिग्री तापमान में जलभुन कर शिद्दत से काम करता हुआ देश का एक बिजली कर्मचारी जो जानता और समझता है कि वो जितनी जल्दी विधुत अवरोध को ठीक करेगा जनसामान्य को उतनी जल्दी भीषण गर्मी से राहत मिलेगी
ऐसे अल्प वेतन भोगी बिजली वीरो को मेरा कोटि कोटि प्रणाम है।
ये कर्मचारी बिना सुविधा के विद्युत व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए दिन-रात काम कर रहे है
गर्मी में इस खबर को भी चलाएं और सामाजिक लोग भी इन बिजली कर्मचारियों को प्रोत्साहित करते रहें, जिससे उनका हौशला बना रहे,44 डिग्री का टॉर्चर: क्या इंसान, क्या मशीन… थोड़ा धैर्य, थोड़ा सहयोग!
विदित हो की आज हमारा पूरा प्रदेश और शहर सूरज की भीषण तपिश से झुलस रहा है।
पारा 44℃ के पार जा चुका है, रातें 30℃ पर उबल रही हैं।
इस असहनीय माहौल में हर कोई अपने घरों में एसी और कूलर के सहारे राहत ढूंढ रहा है।
बिजली की मांग इतिहास के सारे रिकॉर्ड तोड़कर 7,000 मेगावाट के पार जा चुकी है।
लेकिन इस संकट के बीच, हमें एक कड़वी मगर सच्ची हकीकत को समझना होगा।
1. मशीने भी थकी हुई है,उनकी भी एक समय सीमा है
जिस तरह हाड़-मांस के बने हम इंसानों की सहने की एक निश्चित क्षमता होती है, ठीक वैसे ही लोहे और तारों से बनी इन मशीनों की भी एक सीमा होती है। 44 डिग्री की झुलसाती धूप में ये ट्रांसफॉर्मर और केबल बिना रुके, लगातार सुलग रहे हैं।
जब क्षमता से अधिक लोड पड़ता है, तो ये मशीनें भी ‘हांफने’ लगती हैं और आखिरकार दम तोड़ देती हैं।
यह समस्या किसी एक मोहल्ले या शहर की नहीं है, बल्कि इस रिकॉर्ड-तोड़ गर्मी में पूरे देश की है।
2. वो भी किसी के बेटे है किसी के पिता किसी के भाई है,
सोचिए, जब हम अपने घरों में कुछ मिनट के लिए बिजली चले जाने पर छटपटा उठते हैं,
तब बिजली विभाग के कर्मचारी इस जानलेवा धूप में, सड़कों पर, खंभों पर चढ़कर सुलगते हुए ट्रांसफॉर्मरों और फॉल्ट वाले केबलों को ठीक कर रहे होते हैं।
वे भी इसी समाज का हिस्सा हैं।
उनके शरीर में भी वही खून और पानी है जो इस गर्मी में सूख रहा है।
वे अपनी जान जोखिम में डालकर, अपनों को घर पर छोड़कर, सिर्फ इसलिए जूझ रहे हैं ताकि आपके घर का पंखा चल सके।
3. आक्रोश नहीं, आत्मीयता की ज़रूरत है :
बिजली गुल होने पर हमारा गुस्सा आना स्वाभाविक है, लेकिन उस गुस्से को उन बिजली कर्मियों पर निकालना जो खुद इस व्यवस्था को सुधारने में दिन-रात एक किए हुए हैं, कहीं से भी न्यायसंगत नहीं है। वे जादूगर नहीं हैं, वे भी इस व्यवस्था और प्रकृति की मार से जूझ रहे आम इंसान हैं।
एक मार्मिक अपील:
जब अगली बार बिजली जाए, तो सब्र का दामन थामें। विभाग के कर्मचारियों से विवाद करने के बजाय, उनके प्रति थोड़ी सहानुभूति और आदर रखें। इस अप्रत्याशित संकट के समय में पैनिक (घबराहट) न फैलाएं।
हम क्या कर सकते हैं? (एक ज़िम्मेदार नागरिक का फर्ज़)
अनावश्यक लोड कम करें: जिस कमरे में कोई न हो, वहां के एसी, कूलर और लाइट तुरंत बंद कर दें।
पीक आवर्स में सहयोग दें: दोपहर और रात के समय जब बिजली की मांग सबसे ज़्यादा होती है, तब भारी बिजली उपकरणों (जैसे वॉशिंग मशीन, पानी का पंप, या ई-व्हीकल चार्जिंग) का उपयोग टालें।

स्वीकृत लोड का ध्यान रखें: चोरी छिपे या बिना लोड बढ़वाए भारी उपकरण न चलाएं, क्योंकि आपका एक गलत कदम पूरे मोहल्ले को अंधेरे में धकेल सकता है।
वक्त कठिन है, मौसम बेदर्द है, लेकिन हमारा आपसी तालमेल और धैर्य इस जंग को आसान बना सकता है। बिजली कर्मियों के हौसले को तोड़िए मत, इस भीषण गर्मी में उनका संबल बनिए!
शांति बनाए रखें, ज़िम्मेदारी निभाएं।




