

अनिल् साहू
सूरजपुर । दादा-दादी की कहानियों में काला जादू सिर्फ कल्पित कहानी ही नहीं बल्कि अभी भी जीवित हैं, अपने पौराणिक कथानक की वास्तविकताओं के साथ, इन दिनों राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त जादूगर गोगीया सरकार अपना प्रदर्शन पिछले तीन सप्ताह से करते चले आ रहे है। अब केवल कुछ दिन का कार्यक्रम और शेष रह गए है ।सूरजपुर का मंगल भवन पूर्णरूपेण जादूई बन गया है। जहॉं हर खेल के बाद दर्शकों की उत्सुक्ता जैसे और बढ़ जाती है। जादू के बारे में जानने के लिए, जादू की दुनिया में हम ज्यों-ज्यों प्रवेश करते हैं, लगता है हम इसमें डुबते चले जा रहे है। बड़ी ही विचित्र है यह दुनिया और इसके जादूगर। दरअसल जादू की हकिकत है कि जादू के दौरान जादूगर को ध्यान केन्द्रित करना पड़ता है। सभी जीवों के अंदर एक कुंडली होती है, उसे जागृत करना होता है। जादू मूलतः विज्ञान, सम्मोहन और योग विद्या के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक सिद्धांतो पर आधारित पूर्णतः शाष्वत आनंद देने की कला ही नहीं बल्कि कलाओं की कला है। अपने साक्षात्कार के दौरान कहा कि जादू को हम दो श्रेणी में रखते है पहला ब्लैक आर्ट (काला जादू) तथा दूसरा व्हाइट आर्ट (उजला या लाभकारी जादू)। ब्लैक आर्ट तंत्र-मंत्र पर आधारित है, तो व्हाइट आर्ट वैज्ञानिक सिद्धांतो पर। आगे उन्होने कहा कि आज पूरे हिन्दुस्तान में एक अरब से ज्यादा आबादी है। जिसमें इस कला के क्षेत्र में मात्र पॉंच सौ जादूगर होंगे। सफल बड़े जादूगरों को ऊॅंगलियों पर गिना जा सकता है। आज जरूरत है, इस लुप्त होती कला को विकसित करने की। सरकार के उपेक्षात्मक रवैये के कारण यह कला अपनी जन्म भूमि पर ही दम तोड़ रही है। राज्य सरकारों सहित केंद्र सरकार, किसी भी प्रकार की रूचि नहीं ले रही है। जादू कला को पल्लवित एवं पुष्पित करने की दिशा में। आज हिन्दुस्तान की बहुत सी कला संवर्धन के अभाव में लुप्त होती जा रही है। उसमें से एक जादू भी है। यह हिन्दुस्तान की धरोहर है। बात को आगे बढ़ाते हुए जादूगर गोगीया सरकार कहते हैं कि जाद कला आदि काल से चली आ रही है। यह एक ऐसी कला है, जिसका प्रदर्शन परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठकर देख सकते है, और सच्चा आनंद प्राप्त कर सकते हैं। जादूकला और अन्य दृष्यकला में अंतर पूछने पर ये बतलाते हैं कि इस आधुनिक युग में जिस रफ्तार से टेलीविजन, सिनेमा, विडियों सी॰ डी॰ के माध्यम से जो दृष्यावली समाज के समक्ष परोसा जा रहा है और उसका क्या बुरा प्रभाव समाज पर खास कर युवा वर्ग जो देष के कर्णधार है, उनपर जो कुप्रभाव पड़ रहा है, उससे हम सभी अवगत है। मगर सर्कस तथा जादू में वैसी बात नहीं। जादू में तो सभी कलाओं का समावेश है। आपको इसमें वह सब मिलेगा जो आज के युवा वर्ग के मानसिक विकास के लिए आवष्यक है। बातचीत के क्रम को आगे बढ़ाते हुए गोगीया सरकार कहते है कि जादू में विज्ञान, पेंटिंग, म्युजिक, एक्टिंग, हास्य, व्यंग, चातुर्य सब का समावेश है। जादू को परिभाशित करते हुए कहते हैं कि कोई भी कला जब पराकाष्ठा पर पहॅुंचती है, तो उसका प्रभाव जादूमय हो जाता है। यही जादू की सार्थकता भी है।बातों के क्रम में पुछने पर कि जादू क्या है? का उत्तर देते हुए गोगीया सरकार कहते हैं कि अभ्यास और सम्मोहन द्वारा दर्शकों को हर्षित एवं मनोरंजन करने वाली कला है, जादू। इसमें घृणित उद्देष्यों का कोई समावेश नहीं है। मूलतः यह दृष्टिभ्रम पर आधारित कला है। जादू के प्रति क्या लोगों का आकर्षण कम सा होता नहीं लग रहा? इसके जवाब में जादूगर गोगीया सरकार कहते हैं-नहीं, कम से कम महानगरों में यह स्थिति बिल्कुल नहीं है। लोग मंचों पर होनेवाले किसी भी परफॉर्मिंग आर्ट को खुब प्रोत्साहित करते है, क्योंकि मनोरंजन के वर्तमान साधनों से लोग ऊब से गए है। ऐसे में जादू जैसी कला उन्हें भाती है। आपके द्वारा जादू के प्रदर्शित कार्यक्रमो में स्वयं आपका पसंदीदा कार्यक्रम कौन सा है? इसके उत्तर में जादूगर गोगीया बतलाते हैं कि मिश्र की राजकुमारी, बच्चों को दुध पिलाकर अन्य अंगों से निकाल देना, दर्शक के सिर पर चाय बनाना, लड़की को एक डंडे के सहारे हवा में सुला देना, लड़की का सर धड़ से अलग कर देना। लड़के को बिजली के आरा मशीन से दो टुकड़ों में काटकर अलग कर पुनः जोड़ देना। भुतों को मंच पर बुलाना और उनका डांस करना, पलक झपकते घोड़ा गायब कर देना आदि मेरे प्रिय कार्यक्रम हैं। जादू के माध्यम से क्या आपको नहीं लगता कि आज जाने-अनजाने समाज में फैले अंध विष्वास को और बढ़ावा दे रहे है? इसके जवाब में गोगीया मुस्कुराते हुए कहते हैं कि नहीं, मेरा ऐसा मानना है कि मैं जादू के माध्यम से समाज में फैले अंधविष्वास को कम करने में अधिक सहयोग दे रहा हॅुं। क्योंकि जादू पूर्णतः विज्ञान एवं योग के सिद्धांतों पर आधारित है। आगे चर्चा में गोगीया सरकार ने कहा कि इस कला के विकास के लिए काफी साधन व सुविधाओं की आवष्यकता होती है। सरकार या बैंक कोई इस बेरोजगारी के आलम में इसे रोजगार न मानते हुए वित्तिय सहायता प्रदान नहीं करती। यदि सरकार इस कला को प्रोत्साहित करने के लिए गंभीरता से सोचे तो इसके माध्यम से बेरोजगारों के बीच रोजगार की नई सम्भावनायें विकसित होंगी और इस कला का प्रसार भी होगा। आवष्यकता है कि सरकार गंभीरता से विचार करें और वित्तिय सहायता के साथ विश्वविद्यालयों में पठन-पाठन से जोड़े। अन्यथा अपने खोते पहचान के साथ, विलुप्त हो जाएगी, जादू कला।
Author: anil sahu
जिला प्रतिनिधि सूरजपुर







