सुमन चेरवा मौत मामले मे बढ़ा विवाद पोस्ट मार्टम प्रक्रिया पर ऊठे गंभीर सवाल

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सुमन चेरवा मौत मामले में बढ़ा विवाद, पोस्टमार्टम प्रक्रिया पर उठे गंभीर सवाल

आदिवासी समाज और परिजनों ने दोबारा पीएम व निष्पक्ष जांच की मांग की, डॉक्टर के कथित बयान से बढ़ा संशय

सूरजपुर/जरही। सूरजपुर जिले के जरही क्षेत्र में लगभग 14 वर्षीय आदिवासी नाबालिग बच्ची सुमन चेरवा की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत का मामला लगातार गंभीर होता जा रहा है। घटना के बाद पुलिस कार्रवाई, पोस्टमार्टम प्रक्रिया और जांच के तरीके को लेकर परिजनों तथा आदिवासी समाज की ओर से कई सवाल उठाए जा रहे हैं। अब पीड़ित परिवार और समाज की ओर से दोबारा पोस्टमार्टम कराने के साथ पूरे मामले की निष्पक्ष एवं उच्च स्तरीय जांच की मांग की जा रही है।

मामले में सबसे बड़ा सवाल पोस्टमार्टम रिपोर्ट और मौत के कारण को लेकर है। परिजनों का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट सामने आने से पहले ही बच्ची की मौत को आत्महत्या की दिशा में बताया गया, जिससे जांच की निष्पक्षता को लेकर संदेह पैदा हुआ। उनका कहना है कि नाबालिग बच्ची की संदिग्ध मौत के मामले में अंतिम निष्कर्ष वैज्ञानिक साक्ष्यों और पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर ही सामने आना चाहिए।

पोस्टमार्टम प्रक्रिया को लेकर भी सवाल

मृतका के परिजनों की ओर से पोस्टमार्टम की प्रक्रिया को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। परिजनों का आरोप है कि पीएम के दौरान उन्हें उचित जानकारी और प्रक्रिया से दूर रखा गया। हालांकि इन आरोपों की वास्तविक स्थिति आधिकारिक जांच और रिकॉर्ड सामने आने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।

परिजनों और आदिवासी समाज की मांग है कि पोस्टमार्टम से संबंधित सभी दस्तावेज, वीडियोग्राफी, पंचनामा और अन्य प्रक्रिया की जांच कराई जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि पूरी कार्रवाई निर्धारित नियमों के अनुसार हुई या नहीं।

पीएम करने वाली डॉक्टर के कथित बयान से बढ़ा संशय

मामले में पोस्टमार्टम करने वाली डॉक्टर सीमा चौधरी के कथित बयान को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। बताया जा रहा है कि उनके बयान के बाद पोस्टमार्टम प्रक्रिया को लेकर लोगों के बीच कई तरह के सवाल खड़े हुए हैं।

आदिवासी समाज का कहना है कि यदि पोस्टमार्टम को लेकर ही अलग-अलग सवाल सामने आ रहे हैं तो मामले में किसी भी प्रकार की जल्दबाजी करने के बजाय दोबारा पीएम अथवा उच्च स्तरीय मेडिकल जांच कराई जानी चाहिए, ताकि मौत के वास्तविक कारण को लेकर किसी तरह का संदेह न रहे।

CHMO से बातचीत के बाद भी विवाद

मामले को लेकर जिला स्वास्थ्य अधिकारी CHMO डॉ. के.डी. पैकरा से भी बातचीत किए जाने की बात सामने आई है। बताया गया कि उनके द्वारा भटगांव सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी डॉ. रतन प्रसाद मिंज से मीडिया को उपलब्ध रिपोर्ट के संबंध में जानकारी देने को कहा गया।

इसके बाद मीडिया द्वारा डॉ. मिंज से बयान लेने का प्रयास किया गया। परिजनों और स्थानीय लोगों के अनुसार, उन्होंने मीडिया को बयान देने से इनकार कर दिया। उनके कथित तौर पर दिए गए जवाब को लेकर भी अब सवाल उठ रहे हैं। हालांकि इस पूरे घटनाक्रम का आधिकारिक पक्ष सामने आना अभी बाकी है।

आदिवासी समाज ने फिर उठाई दोबारा पीएम की मांग

सूरजपुर आदिवासी समाज के जिला अध्यक्ष भानु प्रताप सिंह पोया ने मामले को लेकर चिंता जताते हुए घटना की निंदा की है। उन्होंने बच्ची की मौत की निष्पक्ष जांच और दोबारा पोस्टमार्टम की मांग की है।

समाज का कहना है कि यह मामला एक नाबालिग आदिवासी बच्ची की मौत से जुड़ा है, इसलिए जांच में किसी भी स्तर पर लापरवाही नहीं होनी चाहिए। समाज की मांग है कि बच्ची की मौत से पहले की परिस्थितियों, उसके संपर्क में रहे लोगों, घटनास्थल, पुलिस कार्रवाई और पोस्टमार्टम सहित हर पहलू की स्वतंत्र रूप से जांच की जाए।

पीड़ित परिवार भी चाहता है दोबारा जांच

मृतका के परिवार की ओर से भी दोबारा पोस्टमार्टम और उच्च स्तरीय जांच की मांग किए जाने की बात सामने आई है। परिवार का कहना है कि उन्हें अपनी बच्ची की मौत का वास्तविक कारण जानने का अधिकार है और जब तक सभी सवालों का स्पष्ट जवाब नहीं मिलता, तब तक उन्हें मामले में संदेह बना रहेगा।

परिवार की मांग है कि जांच किसी दबाव या जल्दबाजी के बजाय वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर की जाए और यदि जांच में किसी की भूमिका या लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदारी तय की जाए।

तहसीलदार ने भी रखा प्रशासनिक पक्ष

वहीं मामले को लेकर जरही नायक तहसीलदार नीलिमा लकड़ा से भी मीडिया द्वारा बातचीत की गई। प्रशासन की ओर से मामले में नियमानुसार कार्रवाई और जांच की स्थिति को स्पष्ट किया गया है। प्रशासन का पक्ष यह है कि पूरे मामले में तथ्यों के आधार पर कार्रवाई की जाएगी।

हालांकि दूसरी ओर परिजनों और आदिवासी समाज की ओर से लगातार उठाए जा रहे सवालों के कारण अब प्रशासन के सामने जांच को पूरी तरह पारदर्शी रखने की चुनौती है।

20 हजार रुपये की सहायता को लेकर भी सवाल

मामले में कथित रूप से दिए गए 20 हजार रुपये की राशि को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। परिजनों और समाज की ओर से यह स्पष्ट किए जाने की मांग की जा रही है कि राशि किस मद में दी गई, किसके द्वारा दी गई और क्या इसका कोई आधिकारिक रिकॉर्ड मौजूद है।

लोगों का कहना है कि यदि यह सरकारी सहायता है तो इसकी जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए। साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि किसी भी प्रकार की आर्थिक सहायता को जांच या न्याय की प्रक्रिया से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।

अब निष्पक्ष जांच पर टिकी नजर

सुमन चेरवा की मौत अब केवल एक परिवार का मामला नहीं रह गया है। पोस्टमार्टम प्रक्रिया, पुलिस के शुरुआती निष्कर्ष, डॉक्टरों के कथित बयान और जांच की पारदर्शिता को लेकर उठ रहे सवालों ने पूरे मामले को गंभीर बना दिया है।

आदिवासी समाज और पीड़ित परिवार की मांग है कि मामले में दोबारा पोस्टमार्टम अथवा सक्षम मेडिकल बोर्ड से जांच कराई जाए और सभी वैज्ञानिक एवं परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की स्वतंत्र जांच हो।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि सुमन चेरवा की मौत आखिर किन परिस्थितियों में हुई? क्या पोस्टमार्टम और वैज्ञानिक जांच से मौत का वास्तविक कारण पूरी तरह स्पष्ट हो सकेगा? और क्या परिवार द्वारा उठाए जा रहे सभी सवालों का प्रशासन निष्पक्ष जांच के माध्यम से जवाब देगा?

मामले में आने वाले आधिकारिक जांच निष्कर्ष ही यह स्पष्ट करेंगे कि सुमन चेरवा की मौत के पीछे वास्तविक वजह क्या थी और जिम्मेदारी किसकी बनती है।

Aashiq khan
Author: Aashiq khan

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