

भरत लाल गुप्ता
मूसलाधार बारिश में भी डटे रहे हजारों दर्शक, आदिवासी संस्कृति, लोककला और 2000 वर्ष पुरानी धरोहरों का बना भव्य संगम
उदयपुर। रामायण काल से जुड़ी ऐतिहासिक एवं पावन धरा रामगढ़ पहाड़ पर आयोजित रामगढ़ महोत्सव 2026 का सोमवार को भव्य शुभारंभ हुआ। छत्तीसगढ़ शासन के संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री राजेश अग्रवाल ने दीप प्रज्ज्वलित कर दो दिवसीय महोत्सव का विधिवत उद्घाटन किया। उद्घाटन समारोह में बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधि, प्रशासनिक अधिकारी, कलाकार और ग्रामीणजन उपस्थित रहे।
अपने संबोधन में मंत्री राजेश अग्रवाल ने कहा कि रामगढ़ केवल एक पहाड़ी नहीं, बल्कि भारतीय साहित्य, संस्कृति और इतिहास की अमूल्य धरोहर है। उन्होंने कहा कि महाकवि कालिदास ने यहीं विश्वविख्यात कृति ‘मेघदूत’ की रचना की थी। यह महोत्सव सरगुजा की समृद्ध आदिवासी संस्कृति, लोककला और ऐतिहासिक विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने का माध्यम बनेगा।

उद्घाटन के बाद शाम करीब 4:30 बजे तेज बारिश शुरू हो गई, लेकिन मौसम भी लोगों के उत्साह को कम नहीं कर सका। हजारों की संख्या में पहुंचे ग्रामीण, महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग बारिश में भी भीगते हुए लोकनृत्य, लोकगीत और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का आनंद लेते रहे। आयोजन स्थल पर लोगों का जोश पूरे समय देखने लायक रहा।
महोत्सव परिसर में स्थानीय कला एवं संस्कृति की आकर्षक झलक भी देखने को मिली। स्वयं सहायता समूहों और स्थानीय कारीगरों द्वारा लगाए गए स्टॉलों में आदिवासी हस्तशिल्प, कोसा वस्त्र, पारंपरिक उत्पाद और स्थानीय कलाकृतियां लोगों के आकर्षण का केंद्र रहीं।

30 जून को महोत्सव के समापन अवसर पर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे। उनके आगमन को देखते हुए पूरे रामगढ़ क्षेत्र में सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए हैं। भारी संख्या में पुलिस बल, महिला पुलिस और सुरक्षा कर्मियों की तैनाती के साथ ड्रोन एवं सीसीटीवी कैमरों से लगातार निगरानी की जा रही है।
समापन समारोह में मुख्यमंत्री उत्कृष्ट लोक कलाकारों, स्वयंसेवी संस्थाओं एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं का सम्मान करेंगे। साथ ही सरगुजा के पर्यटन विकास और रामगढ़ की ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण से जुड़ी महत्वपूर्ण घोषणाएं भी किए जाने की संभावना है।
रामगढ़ महोत्सव का उद्देश्य सीता बेंच, जोगीमारा-लखमारा एवं चंदन माटी गुफाओं जैसी लगभग दो हजार वर्ष पुरानी ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण के साथ सरगुजा की समृद्ध आदिवासी संस्कृति को बढ़ावा देना और छत्तीसगढ़ को देश के सांस्कृतिक पर्यटन मानचित्र पर नई पहचान दिलाना है।
आयोजन समिति ने बताया कि आषाढ़ के प्रथम दिवस पर प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला यह महोत्सव मानव सभ्यता, पुरातत्व, संस्कृति और लोक परंपराओं के संरक्षण का महत्वपूर्ण मंच बन चुका है। हर वर्ष बढ़ती जनभागीदारी को देखते हुए आगामी आयोजन में पेयजल, भोजन, विश्राम एवं अन्य मूलभूत सुविधाओं को और अधिक सुदृढ़ करने का संकल्प लिया गया है, ताकि श्रद्धालुओं और पर्यटकों को बेहतर व्यवस्थाएं उपलब्ध कराई जा सकें।यदि आप चाहें, तो इसे अखबार की **फ्रंट पेज शैली** में और अधिक प्रभावशाली एवं पत्रकारिता भाषा में भी तैयार किया जा सकता है।
Author: anil sahu
जिला प्रतिनिधि सूरजपुर






